डीएनए एक्सप्लेनर
Lok Sabha Elections 2024: भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 400 सीटों पर जीत दर्ज कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भाजपा को उन 160 सीटों का चक्रव्यूह भेदना होगा.
होली आ रही है और इस बार होली के रंगों में चुनावी रंग मिला होगा. दरअसल, इस बार होली के उल्लास के बीच चुनावी हुल्लास भी साफ नजर आएगा. लोकसभा चुनाव की तैयारियां चरम पर होंगी और देश भर में चुनावी समीकरण सुलझाए जा रहे होंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री बनाने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अकेले दम पर 370 और सहयोगियों के साथ यानी भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 400 सीटों पर जीत दर्ज कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है. इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भाजपा को उन 160 सीटों का चक्रव्यूह भेदना होगा, जो पार्टी ने आज तक कभी नहीं जीती हैं.
दो ध्रुवीय चुनाव की कोशिशें विफल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तीसरी बार देश की सत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ होने से रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में दो ध्रुवीय चुनाव की कोशिशें विफल हो गई हैं. कांग्रेस और उसके सहयोगी अन्य दलों ने इंडिया गठबंधन के रूप में एक प्रयोग का प्रयास किया, किंतु उसमें फिलहाल बिखराव व विफलता ही नजर आ रही है. INDIA गठबंधन का चेहरा बनने के दो बड़े दावेदार इससे दूर हो चुके हैं. नीतीश कुमार तो छिटककर दूसरे खेमे यानी NDA में आ गए हैं, वहीं ममता बनर्जी ने इंडिया गठबंधन से दूरी बनाकर एकला चलो रे का राग अलापा है. आम आदमी पार्टी से दिल्ली, हरियाणा, गुजरात में तो कांग्रेस का गठबंधन है, किंतु पंजाब में लड़ाई आप बनाम कांग्रेस हो गई है. शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो-दो हिस्सों में टूट चुकी है. उद्धव ठाकरे व शरद पवार इंडिया गठबंधन के साथ हैं तो दोनों दलों का बड़ा हिस्सा आज एनडीए के साथ है. ओडीशा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना आदि में बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस, तेलुगु देसम, एआईआईडीएमके, अकाली दल, बीआरएस और नेशनल कांफ्रेंस चुनावी लड़ाई को त्रिकोणीय बना रहे हैं.
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कांग्रेस के रिकॉर्ड तोड़ने का लक्ष्य
BJP के नेतृत्व में NDA अगर तीसरी बार सत्ता में वापसी में सफल होता है, तो कई रिकॉर्ड भी टूटेंगे. दरअसल मोदी यदि तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो वे लगातार तीन बार प्रधानमंत्री बनने के पं. जवाहर लाल नेहरू के रेकार्ड की बराबरी कर लेंगे. इसी तरह भाजपा के निशाने पर 1984 में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस द्वारा जीती गई 415 सीटों का रिकॉर्ड भी है. भाजपा ने भले ही एनडीए के रूप में 400 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है, किंतु सचाई यह है कि पार्टी हर हाल में 415 के आंकड़ें को पार करना चाहती है, ताकि राजीव गांधी का रिकॉर्ड टूट सके.
190 सीटों पर सीधा मुकाबला
कई राज्यों में त्रिकोणीय संघर्ष के बावजूद देश में 190 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होना है. मैजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा को भरोसा है कि वह इनमें से अधिकांश सीटें जीत लेगी और इनके सहारे ही अकेले दम पर 370 से अधिक सीटें जीतने के लक्ष्य की मजबूत आधारशिला रखेगी. भाजपा मध्य प्रदेश की 19, गुजरात की 26, राजस्थान की 25, छत्तीसगढ़ की 11, हरियाणा की दस और उत्तराखंड की पांच सीटों में से अधिकांश जीतने को लेकर उत्साहित है. साथ ही हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और कर्नाटक में भी भाजपा ने कांग्रेस को पछाड़ने की उम्मीद लगा रखी है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में से 70 के आसपास जीतकर लक्ष्य प्राप्ति का भरोसा जताया जा रहा है. बंगाल की 42 सीटों में से कम से कम 24 पर जीत का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, वहीं बिहार की 40 में से कम से कम 32, झारखंड की 14 में से 12 सीटों पर भाजपा स्वयं को आगे मान रही है. महाराष्ट्र की 48 में से 40 से अधिक जीतने की बात कही जा रही है, वहीं प्रेक्षक भी मानते हैं कि भाजपा व राजग के पक्ष में यह संख्या तीस तो हर हाल मे पार करेगी. ओड़िशा में भले ही नवीन पटनायक के साथ कोई समझौता न हुआ हो, किन्तु पार्टी 21 में से अधिकांश पर काबिज रहने की रणनीति पर काम कर रही है.
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हारी बाजी को जीतने की जंग
भाजपा के 370 से अधिक सीटें जीतने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा वे 160 सीटें हैं, जहां भाजपा कभी चुनाव नहीं जीती है और इनमें से अधिकांश में तो कभी दूसरे स्थान तक पर भी नहीं पहुंच सकी है. इस चुनाव में भाजपा इसी हारी बाजी को जीतने की जंग लड़ रही है. इसमें बिहार में नवादा, वैशाली, वाल्मीकि नगर, किशनगंज, कटिहार, सुपौल, मुंगेर और गया, तमिलनाडु में रामनाथ पुरम, शिवगंगा, वेल्लोर, कन्याकुमारी, चेन्नई जैसी सीटें तो जीत के लिए चिह्नित की ही गई हैं, उत्तर प्रदेश में रायबरेली और मैनपुरी जैसी सीटों पर जीतकर भाजपा बढ़त बनाना चाहती है. इसके लिए भाजपा ने इन सीटों को काफी पहले से चिह्नित कर रखा है और उन सभी के लिए विशेष रणनीति बनाई गई है. दूसरे दलों से नेताओं को लाने से लेकर लोकसभा क्षेत्रवार पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की तैनाती तक के काम किये गए हैं.
दक्षिण के दुर्ग की बड़ी चुनौती
भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में पूरे देश में सर्वस्वीकार्य पार्टी के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करना चाहती है. इसके लिए देश के दक्षिण का दुर्ग पार्टी के सामने बड़ी चुनौती बन गया है. दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 303 सीटें तो जीत ली थीं, किंतु तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश और पुडुचेरी में खाता खोलने में विफल रही थी. आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भाजपा के साझीदार तेलुगु देसम पार्टी और एआईडीएमके भी साथ छोड़ चुके हैं. वहां इस बार भाजपा अपना खाता खोलने के लिए प्रयासरत है. तेलंगाना में जरूर भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में 17 में से चार सीटें जीती थीं, लेकिन पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में तीसरे स्थान पर पहुंची भाजपा के लिए तेलंगाना भी चुनौती बना हुआ है. कर्नाटक में मजबूती के साथ लड़ रही भाजपा को अब दक्षिण के दुर्ग के अन्य द्वारों पर भी अपना ध्वज लहराना होगी, तभी चार सौ पार के लक्ष्य की प्राप्ति हो सकेगी.
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(27 वर्ष से अधिक की हिन्दी पत्रकारिता के दौरान डॉ.संजीव मिश्र ने देश की समाचार पत्र, पत्रिकाओं में संवाददाता से लेकर संपादक तक की यात्रा तय की है. विभिन्न समाचार पत्रों के संपादकीय विमर्श में नियमित लेखन करते रहे हैं. वह पुस्तक बवाली कनपुरिया के लेखक हैं तथा उन्होंने कई किताबों का हिन्दी में अनुवाद भी किया है.)
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