डीएनए एक्सप्लेनर
हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो कारनामा किया वो इस लिए भी अतुलनीय है क्योंकि अभी कुछ दिन पहले तक ही किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि भाजपा दिल्ली में करिश्मा कर ऐतिहासिक जीत को अंजाम देगी.
चुनावी राजनीति रोचक ट्विस्ट के साथ एक मजेदार युद्ध है. इसमें सैनिक युद्ध के मैदान में नहीं मारे जाते, न ही सेनापति हार कर सेना को सौंपते हैं. हालांकि, जैसा कि दिल्ली विधानसभा चुनावों ने एक बार फिर दिखाया है, युद्ध लड़ने और जीतने का सबसे अच्छा तरीका एक ठोस रणनीति बनाना और उसे युद्ध के मैदान में सटीकता और निर्मम दक्षता के साथ लागू करना है.
एक बार फिर, भारतीय जनता पार्टी ने संकेत दिया है कि जब ठोस रणनीति को लागू करने की बात आती है, तो नरेंद्र मोदी के दौर में इस पार्टी का कोई मुकाबला नहीं है.दिल्ली को लेकर भाजपा की रणनीति क्या थी?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें 1998 के उस दौर का अवलोकन करना होगा जब दिल्ली से बीजेपी आउट हुई थी. तब से लेकर अब तक भाजपा ने दिल्ली दूर है को एक गंभीर चेतावनी की तरह लिया. इसका नतीजा क्या निकला? दिल्ली में भाजपा की प्रचंड जीत के रूप में हमारे सामने है.
कह सकते हैं कि अमित शाह द्वारा चलाए जा रहे चुनावी महासमर के तहत भी, विधानसभा चुनावों के दौरान चुनावी जीत भाजपा के लिए एक मायावी सपना बनी रही क्योंकि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने लगातार शानदार जीत दर्ज की.
लगातार चुनावी हार झेलने के बाद भाजपा के लिए दुविधा सरल थी. लोकसभा चुनाव में दिल्ली के करीब 55 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को चुना था. लेकिन जब विधानसभा चुनाव की बात आई तो इस समूह के 15 प्रतिशत से अधिक लोग आप की ओर चले गए.
इस दुविधा ने इस दौरान भाजपा की रणनीति का आधार बनाया. इस 15 प्रतिशत को पार्टी के साथ बने रहने के लिए राजी करना. दूसरे तरीके से देखें तो रणनीति सीधी थी. आप के वोट शेयर में करीब 10 प्रतिशत की कमी लाना और भाजपा के वोट शेयर में इसी अनुपात में वृद्धि करना.
ध्यान रहे कि सिद्धांत और कागज़ पर किसी के पास भी एक ठोस रणनीति हो सकती है. उदाहरण के लिए, कांग्रेस की रणनीति शहर-राज्य में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने के लिए दोहरे अंकों के वोट शेयर का पीछा करना था.
54 प्रतिशत वोट शेयर सुनिश्चित करने की AAP की रणनीति काफी हद तक बरकरार रही.फिर भी, दोनों विफल रहे जबकि दिल्ली में भाजपा की रणनीति जादू की तरह काम आई. कुछ संशयवादी मोदी-शाह के साथ-साथ अन्य नेताओं द्वारा रणनीतियों को अंजाम देने के बेजोड़ तरीके को श्रेय देने से इनकार करते हैं.
लेकिन 2014 के बाद से, भारत भर में कई युद्धक्षेत्रों में जीत किसी भी निष्पक्ष टिप्पणीकार को अन्य राजनीतिक दलों को भाजपा द्वारा अपनाए जाने और उसका अनुसरण करने की सलाह देने के लिए मजबूर करेगी.
दिल्ली में भाजपा की जीत का अवलोकन करें तो मिलता है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में मतदाताओं द्वारा भाजपा को एक कठोर चेतावनी दिए जाने के एक साल से भी कम समय में कहानी कैसे बदल गई है. तब से, इसने तीन असंभव प्रतीत होने वाली जीत( हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली) हासिल की हैं.
झारखंड में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा जिसे देखकर इस बात की अनुभूति होती है कि कोई भी व्यक्ति या संगठन अचूक नहीं है.
क्या थी भाजपा की रणनीति
सफल रणनीतियों के लिए कुछ चीजों की आवश्यकता होती है. सही समय पर तैनात किए जाने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन, सैनिकों, कई जनरलों और स्टाफ अधिकारियों का एक ऐसा अनुशासित, प्रेरित और प्रतिबद्ध निकाय जो तब अपनी जान लड़ा दे जब लड़ाई अपने चरम पर हो.
ऐसे वक़्त में इन्हें न केवल अचूक हथियारों का इस्तेमाल करना आता हो बल्कि इन्हें ये भी पता हो कि युद्ध जीतने के लिए सेना की तैनाती कहां होनी है और सबसे महत्वपूर्ण बात, रणनीति को जमीन पर लाने की चपलता और क्षमता. दिल्ली विधानसभा चुनावों में, इन सभी कारकों ने अच्छी तरह से काम किया.
वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता भाजपा के लिए लंबे समय से चुनौती नहीं रही है. जरूरत पड़ने पर इसके पास जमीनी स्तर पर किसी भी प्रतिद्वंद्वी से अधिक खर्च करने के लिए पर्याप्त धन है. लेकिन जैसा कि भाजपा को युद्ध के मैदान में मिली कुछ असफलताओं, खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान हुआ, ने दिखाया कि चुनाव जीतने के लिए बहुत सारा पैसा खर्च करना पर्याप्त नहीं है.
सफल रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व जमीन पर प्रेरित और प्रतिबद्ध सैनिकों को तैनात करने की क्षमता है. यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां कोई भी अन्य पार्टी विस्तारित संघ परिवार के संसाधनों और जनशक्ति का उपयोग करने की भाजपा की अद्वितीय क्षमता से मेल नहीं खा सकती है.
2024 के लोकसभा अभियान की तैयारी के अहंकार से भरे दिन बहुत पहले चले गए हैं - जब पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने अनजाने में यह धारणा दी थी कि भविष्य के लिए तैयार इस भाजपा को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कैडर की आवश्यकता नहीं हो सकती है.
हरियाणा, महाराष्ट्र और अब दिल्ली में, नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से सुनिश्चित किया कि नाराज़ कार्यकर्ता सड़कों पर वापस आएं, दरवाज़े खटखटाएं, बूथों परजाएं और विश्वास बनाए रखते हुए संदेश को चुपचाप फैलाएं. दिल्ली के इस अभियान में, ऐसा लगता है कि आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने छोटे-छोटे समूहों के साथ 50,000 से ज़्यादा संवादात्मक सत्र आयोजित किए हैं.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, भारतीय मज़दूर संघ और अन्य सहित संघ परिवार के सभी अन्य संगठनों को अपने लक्षित समूहों पर लगातार ध्यान केंद्रित करने का काम सौंपा गया था.
यह सुनिश्चित करने के लिए कि संबद्ध संगठन विपरीत उद्देश्यों के लिए काम न करें, भाजपा ने एक अच्छी तरह से तैयार सैन्य मशीन की तरह, अपने सैनिकों को पूर्व-चयनित युद्धक्षेत्रों पर ले जाने के लिए स्टाफ अधिकारियों को तैनात किया.
बजरंग दल जैसे संगठन का संचालन करने वाले स्टाफ अधिकारियों को पता था कि इस संगठन की उपस्थिति और बयानबाजी कहां काम करेगी और कहां यह उलटी पड़ सकती है. बीएमएस के सदस्यों को कारखानों और अन्य श्रमिकों से भरे क्षेत्रों में तैनात किया गया था जो अरविंद केजरीवाल के कट्टर समर्थक बन गए थे.
बताया जाता है हर रोज कम से कम एक दर्जन वरिष्ठ भाजपा नेता दिल्ली में सक्रिय रूप से प्रचार कर रहे थे, जुलूसों का नेतृत्व कर रहे थे, रैलियां आयोजित कर रहे थे और कई बैठकों को संबोधित कर रहे थे. यहां लगभग रोजाना ही उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, तेलंगाना, तमिलनाडु और ओडिशा के नेता अलग-अलग इलाकों में प्रचार करते देखे जा सकते थे.
सफल रणनीति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व वह चपलता है जिसके साथ सेना के शीर्ष अधिकारी उग्र युद्ध के बीच रणनीति बदल सकते हैं. अभियान के शुरुआती चरण के दौरान, भाजपा का ध्यान अरविंद केजरीवाल और उनके तथाकथित 'शीश महल' के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर केंद्रित था.
यह पार्टी का मुख्य फोकस बन गया.लेकिन जनवरी की शुरुआत में, सर्वेक्षणों और बूथ-स्तर के कार्यकर्ताओं से आंतरिक प्रतिक्रियाएं आने लगीं कि भ्रष्टाचार के आरोप निम्न वर्ग और गरीब मतदाताओं को प्रभावित करने में विफल रहे हैं जो AAP के प्रति प्रतिबद्ध और वफादार बने हुए हैं.
प्रतिक्रिया स्पष्ट थी: केवल केजरीवाल और AAP को भ्रष्ट करार देने से भाजपा के वोट शेयर में लक्षित 10 प्रतिशत की वृद्धि नहीं होने वाली थी. कुछ ही दिनों में रणनीति बदल गई और नागरिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया गया. बेशक, कुछ नेताओं ने 'शीश महल' की बयानबाजी जारी रखी.
लेकिन कैडर और नेताओं दोनों ने सड़कों की दयनीय स्थिति, खुले और सड़ते कूड़े के ढेर, बंद और खुले सीवरेज की सुविधा, स्वच्छ पेयजल की कमी, यमुना में गंदगी, प्रदूषण और बहुत कुछ को उजागर करना शुरू कर दिया.साथ ही, जमीनी और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं ने धैर्यपूर्वक यह संदेश फैलाया कि कैसे AAP MCD पर नियंत्रण कर रही है.
दिल्ली के नागरिक लंबे समय से पीड़ित थे, और हालात ऐसे हो गए थे कि बेचैनी गुस्से में बदल रही थी. यह गुस्सा निम्न वर्ग के वोट के एक हिस्से को भाजपा की ओर ले जाने के लिए पर्याप्त था. जैसा कि अंतिम वोट शेयर टैली से पता चलता है, भाजपा ने AAP पर जो लगभग तीन प्रतिशत वोट शेयर की बढ़त हासिल की, वह इस उबलते गुस्से के कारण कुछ मध्यम वर्ग के मतदाताओं की वफादारी बदलने का परिणाम था.
मोदी का ब्रह्मास्त्र
और अंत में, एक सफल रणनीति का मतलब यह भी है कि सेना के शीर्ष अधिकारियों के पास युद्ध के चरम के दौरान इस्तेमाल करने के लिए एक गुप्त और घातक हथियार हो. इस अंतिम हमले के लिए नरेंद्र मोदी द्वारा चुनी गई सेनापति निर्मला सीतारमण थीं. समय अनुकूल था क्योंकि चुनाव केंद्रीय बजट के एक सप्ताह से भी कम समय बाद होने वाले थे.
बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती, जैसा कि लोकसभा चुनावों के दौरान भी देखा गया था, मध्यम वर्ग के मतदाताओं में निराशा और मोहभंग की भावना थी
सीतारमण द्वारा इस्तेमाल किया गया ब्रह्मास्त्र आयकर था, विशेष रूप से 1 लाख रुपये प्रति माह तक कमाने वाले सभी नागरिकों को किसी भी आयकर का भुगतान करने से छूट दी गई.
यह दिल्ली में एक सपने की तरह काम किया, जहां सचमुच लाखों लोग केंद्र और राज्य सरकारों में काम करते हैं, साथ ही निजी क्षेत्र के वेतनभोगी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी है. कर छूट ने उन्हें उत्साहित किया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि भाजपा का वोट शेयर 10 प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य काफी हद तक हासिल हो गया.
यदि अन्य राजनीतिक दल दिल्ली चुनावों से यह सबक नहीं सीखते हैं कि रणनीति कैसे बनानी है और उसे कैसे लागू करना है, तो वे भाजपा को एक प्रमुख शक्ति बने रहने देंगे. जिस बजट में आयकर में छूट की पेशकश की गई, वह बिहार के लिए भी बहुत सारे सौगातें लेकर आया. दिल्ली का काम हो चुका है.
भाजपा की युद्ध मशीन पहले से ही नवंबर 2025 में बिहार को अपने पास बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है. कहना गलत नहीं है कि जैसा भाजपा और उसमें भी पीएम मोदी और अमित शाह का स्वाभाव है पार्टी बिहार में भी अपनी परफॉरमेंस से सबको चौंकाएगी.
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