भारत
हाल ही में सपन्न हुई kanwar yatra 2024 को लेकर जहां जनमानस में श्रद्धा का भाव रहा, वहीं इस यात्रा के दौरान हुई हिंसक घटनाएं, शोर-शराबे और डीजे वाली कांवड़ से ट्रैफिक और शहरों में हुई असुविधा की आलोचना की गई, लेकिन कांवड़ यात्रा का स्वरूप क्या हमेशा ऐसा ही रहा है. पढ़िए वंदना राग का यह लेख...बमभोले.
वंदना राग
दिनकर ने कहा है;
दर्शन मात्र विचार, धर्म ही है जीवन।
धर्म देखता ऊपर नभ की ओर,
ध्येय दर्शन का मन।
हमें चाहिए जीवन और विचार भी।
अम्बर का सपना भी, यह संसार भी।
यानी, धर्म का इस संसार में अपना स्थान और अपना मान रहा है। सदियों से धर्म, समय, देशकाल अनुसार अपना ताना-बाना स्थूल और शृंगारिक रूप से बदलता रहा है. धर्म का लोकोपकारी मर्म कभी नहीं बदलता. प्रेम और लोक कल्याण उसके मूल भाव बने रहते हैं. भक्तिकाल के कवि इसके सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं. फिर चाहे वह मीरा हों या सूर, दादू या रैदास.
बिना शर्त, बिना प्रदर्शन, बस समर्पण भाव से प्रेम. यही भाव कलकल करते झरने की तरह खुद के भीतर बहता रहे और समाज को भिगाता रहे.
लेखक परिचय - वन्दना राग मूलत: बिहार के सीवान जिले की हैं. उनका जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ और इन दिनों दिल्ली में बसेरा है. देश के अलग-अलग हिस्सों में रहते हुए लोक, कला, साहित्य और संस्कृति को उन्होंने करीब से देखा, महसूसा. कथाकार-उपन्यासकार के रूप में उनकी पहचान है. कहानियों के चार संग्रह - 'यूटोपिया', 'हिजरत से पहले', 'ख़यालनामा' और 'मैं और मेरी कहानियाँ' के अलावा उपन्यास 'बिसात पर जुगनू' पाठकों के बीच प्रशंसित रहे. कांवड़ यात्रा को लेकर उन्होंने यह आलेख DNA Hindi के लिए लिखा है. ये लेखक के निजी विचार हैं.
कमोबेश इसी से मिलती-जुलती बात दिनकर कहते हैं. धर्म के उद्दात भाव की ओर इशारा करते हैं. वह नभ की ओर देखने वाला विहंगम भाव है. उस भाव में किसी प्रकार का समझौता हो नहीं सकता.
अब अगर धर्म का भाव इतने उच्च किस्म का है तो उसे बरतने का सलीका भी सुंदर और भावविभोर करने वाला होना चाहिए. यही समझने और समझकर बरतने वाली बात है. आजकल यह सबकुछ बरतने के नाम पर ही जटिल और असुंदर हो जाता है.
चूंकि मैं आजकल दिल्ली में रहती हूं तो दिल्ली की ओर से जानेवाली कांवड़ यात्रा का ताजा उदाहरण दे सकती हूं - कैसे उसका शृंगारिक बदलाव फूहड़ और राजनैतिक मंशा से भर गया है. फिर सवाल उठते हैं, क्या कांवड़ यात्रा का इतिहास यही रहा है? यू ही अराजक और बेसम्भाल?
एक मित्र ने जब पूछा तो सहसा कुछ छवियां मन में उमड़ आईं. बचपन में देखे कांवड़िए कौंध गए. जो अत्यंत सादे और कई बार दुष्कर मुद्राएं अपना ( लेट कर, घुमेर लगाकर) बाबाधाम जाया करते थे. मद्धिम आवाज में बोल-बम का उच्चार करते. मानो खुद से बात कर रहे हों. मानो अपने आत्मन से ही बात करते-करते, हवा को लोक कल्याण से मंत्रबिद्ध कर रहे हों. उन दिनों बिहार की कांवड़ यात्रा से मेरा परिचय था. बिहार में ही मेरी रिहाइश थी. स्मृति में चचरे भाई को बहंगी लटकाए , मन में दिनकर के शब्दों का दर्शन विचारते, भाई को सिवान से देवघर जाते देखती हूं और मन आत्मिक शांति से भर जाता है. किशोर वय का मेरा भाई कुछ मांगने नहीं जाता था, वह यात्रा की पवित्रता को आत्मसात करने जाता था. परिवार और गांव के कल्याण की कामना में जाता था. कांवड़ यात्रा का परिश्रम कठिन है. वह इस चुनौती को पूरा करने जाता था. आज वह कहता है कि वे यात्राएं उसके जीवनदर्शन को समृद्ध करनेवाली हुआ करती थीं. उनसे इतने दिनों के आत्मपरीक्षण और आत्मसंबल का हासिल मिला है उसे.
हम समझते हैं, जानते ही हैं कि कैसे भूख ,प्यास और परिश्रम की यात्राएं हमें जन्म और मृत्य की परिभाषाओं से बावस्ता करती हैं और हमें अपने प्रति और समाज के प्रति सहिष्णु बनाती हैं.
ऐसे में आज यह सवाल मन में उठते हैं - कांवड़ यात्रा की कौन सी छवियां मन में रहनेवाली हैं? इसके औचित्य को बनाए रखने के लिए धर्म के किस दर्शन को बरतने का सलीका सीखना होगा? वह जो हमसे बिसरा गया है? इतने दिनों के हल्ले गुल्ले और कांवड़ यात्रियों के लिए किए जा रहे प्रयोजनों से मन में सामूहिक प्रेम उपजने के बजाय एक वितृष्णा सी उपजने लगती है. मैं यह भाव आने देना नहीं चाहती - इसलिए नहीं कि धार्मिक हूं या नोस्टालजिक होना पसंद करती हूं बल्कि इसलिए कि हर भारतीय की तरह उत्सव मनाना पसंद करती हूं मैं. उत्सव मन को उछाह से भरते हैं. जिजीविषा से भरते हैं. वे जीवन में रंग भरते हैं.
आज भी सादगी भरे बोल-बम कहने वाले कांवड़ियों को याद करती हूं और धर्म के लोककल्याणकारी व्यवहार की कांवड़ियों से अपेक्षा करती हूं. कभी-कभी यूं ही अचानक कुछ ऐसे वास्तविक धर्मपरायण लोग दिख भी जाते हैं, यात्रा में शामिल, भीड़ का हिस्सा पर भीड़ से सर्वथा अलग - जैसे कुछ ही दिन पहले देखा गया एक परिवार; अपेक्षाकृत युवा मां-बाप और किशोर बच्चे. चश्मा पहने पढ़नियार बच्चे. मध्यम वर्गीय परिवार. शांति से कांवड़ ढोता हुआ, एक साथ बोल-बम की ध्वनि को लयात्मक सुरों में गाता हुआ, फ़ाहश शोर से परे. रुककर, ठहर कर देखा तो लगा ठीक ही विश्वास है मुझे, धर्म का उच्चतम भाव यहीं साधेगा. यहीं तो बम भोले बसते हैं.
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