डीएनए एक्सप्लेनर
DNA TV Show: चुनाव चाहे विधानसभा के हों या लोकसभा के लिए. आपको राजनेताओं के भाषण की डिक्शनरी अलग ही दिखाई देगी. इनमें कुछ खास शब्द भी शामिल दिखेंगे. ऐसा ही एक शब्द शरिया भी बन गया है, जिस पर तकरार हो रही है. पढ़ें ये डीएनए रिपोर्ट.
DNA TV Show: साल 2024 की सरकार चुनने के लिए देश में चुनाव का दूसरा राउंड भी आज खत्म हो गया, लेकिन अभी पांच राउंड की लड़ाई बाक़ी है. इसीलिये ना तो प्रचार में कमी है, ना ही बयानों में कोई नमी है बल्कि गर्मी है. तुष्टिकरण, ध्रुवीकरण, विभाजन जैसे हिंदी के गूढ़ शब्दों के बीच आज अरबी का एक शब्द चुनाव में आया है. वो है- शरिया. गृह मंत्री अमित शाह ने सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस देश में शरिया लागू करना चाहती है? शरिया नाम सुनते ही ज़ेहन में पहली तस्वीर तालिबान वाली आती है. चुनाव में शरिया शब्द क्यों आया? कांग्रेस पर उंगली क्यों उठी? ये पूरा कनेक्शन जिन्ना की मुस्लिम लीग और उसके बंटवारे के मेनिफेस्टो से क्यों जुड़ता है?
शरिया शब्द चुनाव में कैसे आया?
चुनावी शब्दावली में रोज़ाना एक से एक नये शब्द ट्रेंड कर रहे हैं. आज का शब्द है- शरिया. शरिया यानी इस्लाम को मानने वालों के लिए Way Of Life', लेकिन चुनाव में शरिया शब्द कैसे आया. इसे लेकर आए हैं देश के गृह मंत्री अमित शाह. अमित शाह तीसरे चरण के चुनाव प्रचार के लिए आज मध्य प्रदेश में थे. कांग्रेस और उसके घोषणा पत्र को लेकर बहुत गुस्से में थे. इसी गुस्से में उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि उसके पर्सनल लॉ को आगे बढ़ाने के वादे का क्या मतलब है? क्या कांग्रेस देश को शरिया से चलाना चाहती है? अमित शाह ने कांग्रेस को तुष्टीकरण की आदत से मजबूर बताया और साफ-साफ कहा कि देश में कोई क़ानून धर्म के आधार पर नहीं बन सकता. बीजेपी तीसरी बार सत्ता में आएगी, तो समान नागरिक संहिता यानी UCC ज़रूर लेकर आएगी. देश में एक समान कानून ही चलेगा. पहले गृह मंत्री का पूरा बयान सुनें, उसके बाद विश्लेषण की शुरूआत करते हैं.
शरिया क्या है?
बहुत जरूरी है कि शरिया पर बात करने से पहले आपको ये बता दें कि शरिया है क्या? अरबी में शरिया का अर्थ है- 'रास्ता'.
दरअसल इस्लामी सिद्धांतों के 5 अलग-अलग स्कूल हैं. इनमें 4 सुन्नी स्कूल हैं- हनबली, मलिकी, शफीई और हनफ़ी और पांचवा शिया स्कूल है- जाफरी. इस्लामिक रूल पर इन पांचों के अपने-अपने सिलेबस हैं. इस्लाम में क्या सही है और क्या गलत है, इसे ये अपनी समझ से एक्सप्लेन करते हैं. ये जो आप अक्सर फतवे सुनते हैं कि लड़के-लड़कियां साथ नहीं पढ़ें, उनके स्कूल अलग हों, लड़कियां हिजाब या बुर्के में ही बाहर निकलें, ये सब इन्हीं अलग-अलग स्कूलों की थॉट प्रोसेस है.
इसीलिए आप देखते हैं कि एक इस्लामिक मुल्क में जिन चीजों की मनाही होती है, उसी पर दूसरे मुस्लिम देश में कोई रोकटोक नहीं होती है. जहां भी बंदिशें होती हैं, वहां एक ही रेफरेंस दिया जाता है कि शरिया में ये लिखा है, वो लिखा है और इन्हीं चीज़ों को शरिया लॉ और पर्सनल लॉ से जोड़कर पेश किया जाता है.
अमित शाह ने कांग्रेस से क्यों पूछा शरिया पर सवाल
हम फिर उस सवाल पर आते हैं कि गृह मंत्री अमित शाह ने क्यों पूछा कि कांग्रेस क्या देश में शरिया लागू करना चाहती है? असल में ये पूछने का मौका खुद कांग्रेस ने दिया है. कांग्रेस मेनिफेस्टो के पेज नंबर-8 पर एक पैरा है. इसमें कांग्रेस ने लिखा है- 'कांग्रेस यह सुनिश्चित करेगी कि प्रत्येक नागरिक की तरह अल्पसंख्यकों को भी पोशाक, खान-पान, भाषा और व्यक्तिगत क़ानूनों की स्वतंत्रता हो.'
यहां पर आप 2 शब्दों पर गौर करें. 'व्यक्तिगत क़ानूनों की स्वतंत्रता' तो क्या इसे पर्सनल लॉ की स्वतंत्रता ना माना जाए, जिसका आधार ही शरिया है? दूसरा शब्द है पोशाक की स्वतंत्रता. क्या इसे इस तरह ना देखा जाए कि हिजाब और बुर्के को कांग्रेस हठ नहीं, बल्कि हक़ के तौर पर मान्यता देने का वादा कर रही है?
BJP क्यों कर रही कांग्रेस के इस वादे का विरोध
बीजेपी जिस विचारधारा से आती है, उसके तीन ही प्रमुख वचन थे- राम मंदिर, धारा 370 हटाना और UCC यानी समान नागरिक संहिता लागू करना. इनमें से दो वचन पूरे हो चुके हैं, और तीसरे यानी UCC पर बीजेपी का वादा है कि सत्ता की हैट्रिक लगाते ही उसे भी पूरा करेगी. 'एक देश, एक विधान' की दिशा में वो किस्तों में काम शुरू भी कर चुकी है. कुछ उदाहरण देखिये-
ये सब सैंपल हैं कि देश में धर्म के नाम पर पर्सनल लॉ के लिए अब कोई स्पेस नहीं है. अधिकार बराबर हैं तो क़ानून भी एक समान होगा. उसमें कोई मज़हबी डिस्काउंट नहीं होगा. इसीलिये जब कांग्रेस पर्सनल लॉ को प्रोटेक्शन देने का वादा करती है. इस पर्सनल लॉ को रोकने वाले कानून को ही रद्द करने का वादा करती है, तो सवाल उठते हैं कि कहीं ये जिन्ना का एजेंडा थोपने की कोशिश तो नहीं है?
कांग्रेस के मेनिफेस्टो पर पहले से ही उठ रहे सवाल
आप कुछ दिनों से सुन रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस के घोषणा पत्र को लगातार मुस्लिम लीग का मेनिफेस्टो बता रहे हैं. कांग्रेस की सोच को मोहम्मद अली जिन्ना की विभाजनकारी सोच जैसा बता रहे हैं. एक बार प्रधानमंत्री का ये बयान याद कीजिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का मेनिफेस्टो मुस्लिम लीग का मेनिफेस्टो है. अब आपको जानना चाहिए कि कांग्रेस के मेनिफेस्टो के वो कौन से हिस्से हैं, जनकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी उस पर मुस्लिम लीग की छाप बता रहे हैं. चुनाव से कई दिनों पहले कांग्रेस ने एक नारा दिया था- 'जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी'. राहुल गांधी के मुंह से ये नारा आपने कई बार सुना होगा. कांग्रेस के घोषणा पत्र में इसी हिस्सेदारी वाली बात को अलग-अलग बिंदुओं में समझाया गया है. अगर कांग्रेस के नारों और चुनावी वादों को जोड़ा जाए तो जो क्रम बनता है, वो कुछ ऐसा दिखता है-
भारत विभाजन की जड़ में भी यही 'हिस्सेदारी' थी
आप इसे संयोग कह सकते हैं कि भारत विभाजन की जड़ में, उसके मूल में मोहम्मद अली जिन्ना के जो 14 सूत्र थे, उनमें से भी कई सूत्र इसी 'हिस्सेदारी' के सिद्धांत पर थे. 1928 में मोहम्मद अली जिन्ना ने ये 14 सूत्र मोतीलाल नेहरू कमेटी में रखे थे. इसमें वही 'हिस्सेदारी' वाला तत्व था, जो बाद में देश के बंटवारे का आधार बना. कांग्रेस और नेहरू कमेटी ने जिन्ना के 14 सूत्र सिरे से खारिज कर दिए. जवाहरलाल नेहरू ने तो इन्हें Funny Ideas तक कहा, लेकिन 1929 में मुस्लिम लीग का दिल्ली अधिवेशन हुआ तो जिन्ना के ये 14 सूत्र सिर माथे पर रखे गए, और फिर यही 14 सूत्र ऑल इंडिया मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र बन गए. आपको बताते हैं उन 14 सूत्रों में क्या था?
आपने देखा, जिन्ना के हर सूत्र का सार था- 'हिस्सा'. नेहरू कमेटी ने जब जिन्ना के ये सूत्र ठुकराए तो जानते हैं उस रिपोर्ट को मुस्लिम लीग ने क्या कहा था? उसे कहा था- 'मुसलमानों का डेथ वारंट'. रिपोर्ट को नहीं माना, और आखिर देश को बांट दिया. शरिया और पर्सनल लॉ से लेकर कांग्रेस मेनिफेस्टो और जिन्ना के 14 सूत्रों तक. ये पूरा क्रम आपने देखा. कहीं ना कहीं, इन्हें ही जोड़कर आज गृह मंत्री अमित शाह ने पूछा कि- क्या कांग्रेस भारत में शरिया लागू करना चाहती है?
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