डीएनए एक्सप्लेनर
बिहार में भाजपा यह महसूस करती है कि यादव वोट बैंक आरजेडी के खेमे में है और उनके प्रति वफादार है. इसलिए बेहतर यही है कि अन्य छोटी जातियां पर दांव खेला जाए और उन्हें अपने पाले में लाया जाए.
बीते दिन ही बिहार में सीएम नीतीश कुमार ने सोशल इंजीनियरिंग और क्षेत्रीय एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया है. इस कदम से यह स्पष्ट हो गया है कि कोई भी राजनीतिक दल विकास और रोजगार की बड़ी-बड़ी बातें तो कर सकता है लेकिन चुनाव से ठीक पहले जातिगत राजनीति को नजरअंदाज नहीं कर सकता. ध्यान रहे कि भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार के ज़रिए जाति और क्षेत्रीय आधार को मज़बूत किया है. वहीं विपक्ष ने पहले ही साफ़ कर दिया है कि बिहार चुनाव में जाति को ही मुद्दा बनाया जाएगा. जिक्र बिहार और जाति का हुआ. तो ऐसे में यादवों को इग्नोर करने का रिस्क शायद ही कोई ले. मगर भाजपा ने ऐसा कर राजनीतिक पंडितों को चक्कर में डाल दिया है.
बताते चलें कि बिहार में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में बीजेपी के सात विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली. और इसी के साथ मंत्रिमंडल में संख्या के मामले में भारतीय जनता पार्टी ने जेडीयू को पीछे छोड़ दिया है. वर्तमान में नीतीश के मंत्रिमंडल में बीजेपी के 21 मंत्री हैं. जबकि जेडीयू के मंत्रियों की संख्या 13 मंत्री है.
अब बड़ा सवाल यह है कि, वो बीजेपी, जो अन्य राज्यों में छितरे हुए यादव वोटबैंक को एकजुट करने के लिए यादव नेताओं पर दांव लगा रही है. आखिर उसने बिहार में 21 मंत्रियों में एक भी यादव को मौका क्यों नहीं दिया?
कहीं ऐसा तो नहीं कि बिहार में भाजपा यह महसूस करती है कि यादव वोट बैंक आरजेडी के खेमे में है. और उनके प्रति वफादार है. इसलिए बेहतर यही है कि अन्य छोटी जातियां पर दांव खेला जाए और उन्हें अपने पाले में लाया जाए.
यदि भाजपा बिहार में गैर-यादव जातियों पर फोकस करने की रणनीति पर काम कर रही है तो इसका अर्थ यही निकलता है कि अब बिहार में भाजपा का पूरा ध्यान पिछड़ी जातियों, अत्यंत पिछड़ी जातियों, भूमिहारों और राजपूतों पर है. ध्यान रहे कि सात नए मंत्रियों में से चार मिथिलांचल से हैं, जहां से एनडीए के 30% विधायक चुने गए हैं.
बिहार में 54 विधायक ऐसे हैं जो यादव बिरादरी से आते हैं. इसमें सबसे ज्यादा आरजेडी से 35, बीजेपी से 8, जेडीयू से 7, लेफ्ट से 3 और कांग्रेस से एक यादव विधायक है. यानी आरजेडी के बाद सबसे ज्यादा यादव विधायक बीजेपी के पास है.
इसके बावजूद बीजेपी ने बुधवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में किसी यादव को मंत्री को जगह न देकर यह संकेत दे दिया है कि, भाजपा का ध्यान उन वोटर्स पर है, जिनकी संख्या भले ही कम हो. मगर जिनका साथ आना लंबे वक़्त तक भाजपा के लिए फायदेमंद रहेगा.
यदि बिहार के जाति सर्वेक्षण के आंकड़ों को ध्यान में रखा जाए, तो नीतीश मंत्रिमंडल में केवल 15.525% उच्च जातियों से 31% मंत्री हैं, लेकिन इसमें 27.12% पिछड़ी आबादी से 28% मंत्री, 19.65% अनुसूचित जातियों से 19% मंत्री बनाकर आनुपातिक प्रतिनिधित्व बनाए रखा है.
किसी भी यादव विधायक को मंत्री न बनाकर बीजेपी ने साफ संदेश दिया है जो हमारे साथ नहीं, हम उसके साथ नहीं.
बाकी जीत और हार पर जैसा भारतीय जनता पार्टी का रवैया रहता है और जैसे वो तमाम पहलूओं का अवलोकन करती है. माना यही जा रहा है कि बिहार में अब वो उन जगहों जैसे मिथलांचल और सीमांचल पर फोकस करेगी जहां उसे अवसर दिख रहे हैं.
यानी मौजूदा वक़्त में भाजपा इस बात को समझ चुकी है कि चाहे वो मल्लाह हों या फिर मुसहर, कुशवाहा, कोरी, पासी और वैश्य. यदि इन वोटों को साध लिया गया तो बिहार में शायद उसे किसी के साथ ही जरूरत न हो. जैसे उसने एमपी, हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड का किला फ़तेह किया वैसा ही कुछ मिलता जुलता हाल उसे आने वाले वक़्त में बिहार में भी देखने को मिले.
हम फिर इस बात को दोहरा रहे हैं कि बिहार में भाजपा उन जातियों पर फोकस कर रही है, जो लंबे समय तक उसके प्रति वफादार रहे. ऐसे में जिस तरह उसने यादवों को दरकिनार किया है, यक़ीनन ही भाजपा की ये रणनीति आरजेडी, लालू यादव समेत अन्य यादव नेताओं को प्रभावित करेगी.
गौरतलब है कि जल्द ही बिहार में विद्धानसभा के चुनाव होने हैं. और रणनीति को लेकर जो भारतीय जनता पार्टी की स्टाइल रहती है, वो बड़े बड़े राजनीतिक पंडितों को हैरान ठीक वैसे ही करती है, जैसा इस बार के मंत्रिमंडल विस्तार में यादव नेताओं को उसका न शामिल करने का फैसला.
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